Wednesday, July 29, 2026
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ऊधम सिंह नगर

महिला आरक्षण को परसीमन से जोड़ना लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ है

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान

कुर्मी महासभा की प्रदेश अध्यक्ष शिवांगी गंगवार ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र और राज्यों की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि परसीमन का हवाला देकर महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार देने में देरी करना पूरी तरह अनुचित है। यह विषय केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबरी का स्थान देने से जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित किए बिना सशक्त लोकतंत्र की कल्पना अधूरी है। ऐसे में यह तर्क देना कि महिला आरक्षण केवल परसीमन के बाद ही लागू होगा, वास्तविकता से दूर और महिलाओं की आकांक्षाओं को टालने का एक माध्यम मात्र है।शिवांगी गंगवार ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान संसद को यह अधिकार देता है कि वह आवश्यक संशोधनों के माध्यम से महिलाओं को तत्काल आरक्षण प्रदान कर सकती है। पंचायत और नगर निकाय चुनावों में बिना किसी परसीमन की प्रतीक्षा किए महिलाओं को आरक्षण दिया गया, जिसका सकारात्मक परिणाम पूरे देश में देखा जा रहा है। आज लाखों महिलाएं जनप्रतिनिधि के रूप में सफलतापूर्वक अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं।

उन्होंने कहा कि मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के भीतर ही महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण संभव है और चुनावों में उनका रोटेशन भी किया जा सकता है। इसके लिए परसीमन को अनिवार्य शर्त बनाना आवश्यक नहीं है।

प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि वर्षों से महिला आरक्षण को टालने के लिए जनगणना और परसीमन जैसे मुद्दों को बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जो महिलाओं के अधिकारों के साथ अन्याय है। यदि सरकारों में वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जा सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि महिलाओं ने हर क्षेत्र—चाहे वह प्रशासन हो, शिक्षा, विज्ञान, सेना या व्यापार—में अपनी क्षमता साबित की है। ऐसे में उन्हें नीति-निर्माण की सबसे बड़ी संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व देने में देरी करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अंत में शिवांगी गंगवार ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे महिला आरक्षण के मुद्दे पर स्पष्ट और ईमानदार रुख अपनाएं। महिलाओं को अब आश्वासन नहीं, उनका अधिकार चाहिए। लोकतंत्र में आधी आबादी को बराबरी का स्थान देना सरकारों की जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है।

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