महिला आरक्षण पर सियासत गरम: उत्तराखंड में “पावर गेम” की आहट! एडवोकेट शिवांगी गंगवार
रिपोर्ट: एडवोकेट शिवांगी गंगवार
देश की राजनीति में महिला आरक्षण को लेकर नई हलचल तेज हो गई है, और इस बार केंद्र में है उत्तराखंड। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “विकसित भारत” विजन के बीच महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात अब सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रही—इसके पीछे बड़े राजनीतिक समीकरण बनते नजर आ रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो उत्तराखंड में विधानसभा सीटों के परिसीमन का प्लान तेजी से आगे बढ़ रहा है। 70 से बढ़ाकर 105 सीटें करने की चर्चा ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। जानकार इसे सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले “गेम चेंजर” मान रहे हैं।
इस संभावित बदलाव के साथ महिला आरक्षण का दायरा भी बढ़ेगा, जिससे बड़ी संख्या में नई महिला उम्मीदवारों के लिए दरवाजे खुल सकते हैं। लेकिन सवाल यह है—क्या ये मौके जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं को मिलेंगे, या फिर राजनीतिक घरानों की महिलाओं के बीच ही सिमट कर रह जाएंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर टिकट बंटवारे में पारदर्शिता नहीं आई, तो महिला आरक्षण सिर्फ “नाम का सशक्तिकरण” बनकर रह जाएगा वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि असली बदलाव तभी होगा जब गांव-गांव में काम करने वाली महिलाओं को आगे लाया जाएगा
उत्तराखंड, जहां महिलाएं खेती से लेकर परिवार तक हर मोर्चे पर मजबूत भूमिका निभाती हैं, वहां अब राजनीति में भी उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग जोर पकड़ रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है—महिला आरक्षण अब सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक दांव बन चुका है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह “मलाईदार मौका” वास्तव में महिलाओं के हाथ लगता है या फिर सियासत की थाली में ही घूमता रह जाता है।।

