ऊधम सिंह नगर

निजी स्कूलों की मनमानी पर लगे लगाम, अभिभावकों को मिले राहत: शिवांगी गंगवार

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

उधम सिंह नगर। कुर्मी महासभा की प्रदेश अध्यक्ष एवं अधिवक्ता शिवांगी गंगवार ने निजी विद्यालयों द्वारा हर वर्ष पाठ्यक्रम और पुस्तकों में किए जा रहे अनावश्यक बदलावों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति अब एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिससे अभिभावकों पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि कई निजी स्कूल मामूली बदलाव—जैसे एक-दो अध्याय, कुछ पेज या डिजिटल सामग्री—का हवाला देकर हर साल पूरी किताबें बदल देते हैं। इससे अभिभावकों को मजबूरी में हर शैक्षिक सत्र में नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। पहले से ही फीस, यूनिफॉर्म, परिवहन और अन्य खर्चों से जूझ रहे परिवारों, विशेषकर मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के लिए यह स्थिति बेहद कठिन हो गई है।शिवांगी गंगवार ने इस मुद्दे के पर्यावरणीय पहलू पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हर वर्ष नई किताबों की छपाई के कारण कागज की मांग बढ़ती है, जिससे पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है। यह सीधे तौर पर पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं को बढ़ावा देता है।

उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि कई विकसित देशों में “बुक री-यूज़ सिस्टम” सफलतापूर्वक लागू है, जहां छात्र सत्र समाप्त होने पर अपनी किताबें स्कूल में जमा कर देते हैं और अगले वर्ष वही पुस्तकें अन्य छात्रों को उपलब्ध कराई जाती हैं। इस व्यवस्था से न केवल आर्थिक बोझ कम होता है, बल्कि बच्चों में संसाधनों के संरक्षण की भावना भी विकसित होती है।

प्रदेश अध्यक्ष ने मांग की कि भारत में भी ऐसी व्यवस्था को लागू किया जाए साथ ही, निजी विद्यालयों को कम से कम 3 से 5 वर्षों तक एक ही पाठ्यक्रम और पुस्तकों को बनाए रखने के लिए बाध्य किया जाए “बुक बैंक” या “री-यूज़ बुक सिस्टम” को अनिवार्य बनाकर पुरानी किताबों के पुनः उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।

उन्होंने सरकार, शिक्षा विभाग और संबंधित नियामक संस्थाओं से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की। उनका कहना है कि निजी स्कूलों की मनमानी पर नियंत्रण से अभिभावकों को राहत मिलेगी, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा।।

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