किच्छा की सियासी बिसात पर बेहड़ का ‘चौका’ भारी – पूर्व विधायक शुक्ला के दस साल पर बेहड़ के चार साल भारी – 2027 की डगर में शुक्ला के सामने बड़ी चुनौती
किच्छा की सियासी बिसात पर बेहड़ का ‘चौका’ भारी
– पूर्व विधायक शुक्ला के दस साल पर बेहड़ के चार साल भारी
– 2027 की डगर में शुक्ला के सामने बड़ी चुनौती
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
किच्छा। उत्तराखंड की राजनीति में तराई की बेल्ट हमेशा से ही सत्ता के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है, और इस बेल्ट में किच्छा विधानसभा सीट का अपना एक अलग ही रसूख है। हालांकि 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी वक्त शेष है, लेकिन किच्छा की फिजाओं में सियासी कसरत की खुशबू अभी से तैरने लगी है। क्षेत्र की जनता के बीच संभावित प्रत्याशियों के कामकाज की तुलना अब बहस का रूप ले चुकी है। राजनीतिक गलियारों और आम चौपालों पर होने वाली इन चर्चाओं का लब्बोलुआब यह है कि मौजूदा कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ के महज चार साल का कार्यकाल, भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के दस साल के लंबे शासनकाल पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।
किच्छा के इस बदलते सियासी मिजाज को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखना जरूरी है। रुद्रपुर की राजनीति में दो बार की हार के बाद जब तिलकराज बेहड़ ने किच्छा की ओर रुख किया था, तो कई राजनीतिक पंडितों ने इसे एक जोखिम भरा कदम बताया था चर्चा थी कि रुद्रपुर छोड़कर किच्छा में नई पारी शुरू करना बेहड़ के लिए आत्मघाती हो सकता है, लेकिन वक्त ने साबित किया कि बेहड़ का यह दांव मास्टरस्ट्रोक था। प्रदेश भर में ‘मोदी लहर’ के बावजूद बेहड़ ने न केवल जीत हासिल की, बल्कि भाजपा के दो बार के विधायक राजेश शुक्ला के मजबूत किले को ढहाकर यह साबित कर दिया कि जमीनी राजनीति में अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता।
आज किच्छा की जनता के बीच बेहड़ के चार साल बनाम शुक्ला के दस साल की जो तुलना हो रही है, उसके पीछे ठोस कारण नजर आते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि तिलकराज बेहड़ ने बेहद कम समय में क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं, जैसे सड़क, पेयजल और बिजली की स्थिति को सुधारने के लिए जिस सक्रियता से काम किया है, उसने जनता के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ा है। बेहड़ की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘सुलभता’ मानी जा रही है। विधायक बनने के बाद भी उनकी क्षेत्र में निरंतर उपस्थिति और आम आदमी की समस्याओं को सीधे सुनने की कार्यशैली और जनहित के मुद्दों पर प्रशासन से भिड़ने की उनकी कार्यशैली ने उनके प्रति जन-विश्वास को और मजबूत किया है। यही कारण है कि जनता उनके चार साल के छोटे कार्यकाल को राजेश शुक्ला के दस साल के कार्यकाल से कहीं अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुखी मान रही है।
दूसरी ओर, पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के लिए 2027 की डगर पहले के मुकाबले कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होती नजर आ रही है। हालांकि शुक्ला एक बार फिर पूरे दमखम के साथ चुनावी समर में कूदने की तैयारी कर रहे हैं और उनके समर्थक उनके कार्यकाल में हुए बड़े प्रोजेक्ट्स का हवाला दे रहे हैं, लेकिन बेहड़ द्वारा स्थापित की गई सक्रियता की नई लकीर को पार करना उनके लिए आसान नहीं होगा किच्छा में इस समय मुकाबला केवल दो चेहरों के बीच नहीं, बल्कि दो कार्यशैलियों के बीच है। एक तरफ शुक्ला का दस साल का अनुभव है, तो दूसरी तरफ बेहड़ की वह चार साल की आक्रामकता है जिसने उन्हें क्षेत्र में फिर से वही पुराना रुतबा और रसूख दिला दिया है।
फिलहाल किच्छा का सियासी परिदृश्य एक रोचक मोड़ पर खड़ा है। विकास कार्यों और जनसंपर्क के आधार पर शुरू हुई यह तुलना आने वाले समय में क्षेत्र की राजनीति को और गरमाएगी जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा कि राजेश शुक्ला अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए क्या नया दांव खेलते हैं और तिलकराज बेहड़ अपनी इस ‘बादशाहत’ को बरकरार रखने के लिए किस रणनीति का सहारा लेते हैं। फिलहाल तो किच्छा की हवाएं यही संदेश दे रही हैं कि यहाँ ‘परफॉरमेंस’ ही 2027 की सत्ता की चाबी बनेगी।।

