Monday, September 14, 2026
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ऊधम सिंह नगर

सिंह के नगर में कौवों का उधम…।

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

कहते हैं एक बड़े प्रदेश में एक घना जंगल था उस जंगल का एक हिस्सा बहुत खास माना जाता था — सिंह का नगर वजह भी खास थी, क्योंकि यह इलाके का राजा का अपना गृह जनपद माना जाता था।

इसी नगर में एक दिन एक बूढ़ा कौआ उड़ते-उड़ते जंगल के स्वास्थ्य महकमे के बड़े दफ्तर की छत पर जा बैठा नीचे कुछ फाइलें सरक रही थीं, कुछ लोग धीमी आवाज में बातें कर रहे थे और कुछ चेहरों पर रहस्यमयी मुस्कानें तैर रही थीं।

कौआ थोड़ा और झुका… और जो सुना, उससे उसकी आंखें गोल हो गईं।

शाम को वह अपने पुराने पीपल के पेड़ पर लौटा तो वहां पहले से ही कौवों की पंचायत जमी हुई थी कौआ ने गला खंखारा और बोला — “भाइयों, आज जो सुना है, वह साधारण कहानी नहीं है। यह राजा के अपने इलाके की कहानी है… सिंह के नगर की कहानी।”

कौवों की पंचायत में हलचल मच गई।

कौआ बोला — “जंगल के स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों एक बड़े साहब की खूब चर्चा है। कहते हैं कि उनके इशारे के बिना वहां पत्ता भी नहीं हिलता और इन बड़े साहब का एक खास प्रिय पक्षी भी बताया जाता है, जो प्रदेश के पूर्व राजा के बेटे की बस्ती में एक मजबूत डाल पर बैठा है। उसका नाम भी बड़े ठाट से लिया जाता है — सितारजंग।”

इतना सुनते ही एक जवान कौआ बोला — “फिर क्या हुआ?”

बूढ़ा कौआ मुस्कुराया और बोला — “फिर वही पुरानी कहानी शुरू हो गई… प्यासा कौआ और मटका।”

लेकिन इस बार कहानी में थोड़ा फर्क है। यहां मटका पानी का बताया जा रहा है, लेकिन उसमें गिर रहे कंकरों की चर्चा ज्यादा है।

कहते हैं कि पूर्व राजा के बेटे की बस्ती में रखा यह मटका धीरे-धीरे भर रहा है। कोई छोटा कंकर डाल रहा है, कोई बड़ा। जैसे-जैसे कंकर गिरते हैं, वैसे-वैसे मटके का पानी ऊपर आता जा रहा है।अब सवाल यह है कि ये कंकर आखिर आते कहां से हैं। जंगल में तरह-तरह की फुसफुसाहटें हैं। कोई कहता है अस्पतालों की तरफ से आते हैं, कोई कहता है क्लीनिकों की तरफ से कुछ चिड़ियां तो यहां तक कह रही हैं कि ऊपर बैठे बड़े साहब की छाया भी इस मटके पर बनी हुई है।

कौवों की पंचायत में एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। बताया जाता है कि बड़े साहब की सरकारी गाड़ी इन दिनों खूब चमक रही है। उस पर लाल-नीली बत्ती भी जगमगा रही है। अब जंगल के कुछ समझदार पक्षी कह रहे हैं कि ऐसी बत्तियां तो आम तौर पर आपातकालीन सेवाओं के लिए होती हैं। फिर यह चमक किस नियम से हो रही है — यह भी जंगल की एक पहेली बन चुकी है।

इसी बीच पुलिस भर्ती वाले तालाब की कहानी भी हवा में तैर रही है। बड़े साहब का कहना है कि कुछ अभ्यर्थियों को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल भेजा गया था। लेकिन अस्पताल के घोंसलों में बैठे पक्षी कह रहे हैं — “भाई, हमारे यहां तो कोई आया ही नहीं।”

अब कौवों की पंचायत में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है —

आखिर सच कौन बोल रहा है और कौन पंख झाड़कर उड़ रहा है?

पेड़ पर बैठे पक्षी कुछ देर तक चुप रहे। फिर एक बूढ़े कौए ने धीरे से कहा —

“भाइयों, मटका जब ज्यादा भर जाता है तो कभी भी टूट सकता है। और जब मटका टूटता है, तो कंकर भी बाहर आ जाते हैं और पानी भी।”

कहते हैं, यह बात कहकर वह कौआ उड़ गया।

पीछे बस उसकी आवाज गूंजती रही —

काँव… काँव… काँव…

और जंगल अब भी इंतजार कर रहा है कि कोई आए… मटके में झांककर देखे… कि आखिर उसमें इतने कंकर आ कहां से रहे हैं।।

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