ऊधम सिंह नगर

सुशासन पर भारी पड़ रहा ‘दागी’ का रसूख – जीरो टॉलरेंस के दावों की हवा निकाल रहे नानकमत्ता के प्रभारी ईओ – भ्रष्टाचार की जांचें फाइलों में दफन, कार्रवाई के बजाय मिला रहा ‘प्रमोशन’

सुशासन पर भारी पड़ रहा ‘दागी’ का रसूख

– जीरो टॉलरेंस के दावों की हवा निकाल रहे नानकमत्ता के प्रभारी ईओ

– भ्रष्टाचार की जांचें फाइलों में दफन, कार्रवाई के बजाय मिला रहा ‘प्रमोशन’

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

रूद्रपुर।प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जहाँ एक ओर शासन-प्रशासन में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को अपनी सरकार का मूलमंत्र बताते हुए भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करने का दावा करते हैं, वहीं जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी इन दावों की जड़ें खोदने में लगे हैं। उधम सिंह नगर जिले की नानकमत्ता नगर पंचायत में तैनात प्रभारी अधिशासी अधिकारी (ईओ) राकेश कोटिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बनते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों और जांचों के भंवर में फंसे होने के बावजूद, कोटिया पर शासन की ’मेहरबानी’ चर्चा का विषय बनी हुई है। आलम यह है कि इनके विरुद्ध की गई पूर्व की जांचें और वर्तमान में चल रही तीन महत्वपूर्ण जांचें केवल सरकारी फाइलों में धूल फांक रही हैं।फर्जी नियुक्ति का ‘कलंक’ और अनसुनी सिफारिशें

राकेश कोटिया का सरकारी सेवा का सफर विवादों के साथ ही शुरू हुआ था। दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2002 में नगर पालिका खटीमा में लेखा लिपिक के पद पर उनकी नियुक्ति को अवैध और नियमों के विरुद्ध बताया गया था। मामला तब तूल पकड़ा जब 2012 में निदेशक शहरी विकास के आदेश पर तत्कालीन जिलाधिकारी ने इसकी जांच कराई। उपजिलाधिकारी खटीमा की जांच आख्या में इस नियुक्ति को स्पष्ट रूप से ‘फर्जी’ पाया गया था। वर्ष 2014 में जिलाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट शासन को भेजकर नियुक्ति निरस्त करने और कड़ी कार्रवाई की संस्तुति की थी, लेकिन रसूख के चलते आज एक दशक बीत जाने के बाद भी शासन स्तर पर फाइल को दबा दिया गया।

दोषी पाए जाने पर भी मिला ‘पदोन्नति’ का इनाम

कोटिया की कार्यप्रणाली पर सवाल यहीं खत्म नहीं होते। वर्ष 2020 में खटीमा नगर पालिका में हुए करोड़ों रुपये के चर्चित घोटाले की जांच में तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट 5 फरवरी 2024 को जिलाधिकारी को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में तत्कालीन ईओ धर्मानंद शर्मा के साथ राकेश कोटिया को भी दोषी करार दिया गया था। विडंबना देखिए कि जहाँ धर्मानंद शर्मा पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई, वहीं कोटिया को दंड देने के बजाय पदोन्नति का ‘तोहफा’ देते हुए प्रभारी अधिकारी बेरीनाग बना दिया गया। इसके बाद केलाखेड़ा नगर पंचायत में तैनाती के दौरान भी व्यक्तिगत लाभ के लिए गलत कार्यों में इनका नाम उछला, जिससे तंग आकर वहां के लिपिक ने कई शिकायतें की थीं। जिसके चलते इनका स्थानांतरण नानकमत्ता कर दिया गया। 

 ‘टेंडर का खेल’ और लाखों का हेरफेर

केलाखेड़ा से स्थानांतरण के बाद नानकमत्ता पहुँचते ही कोटिया ने अपनी पुरानी शैली में काम शुरू कर दिया। उन पर आरोप है कि उन्होंने एक खास ठेकेदार के साथ सांठगांठ कर लाखों रुपये के ‘डोर-टू-डोर’ कूड़ा कलेक्शन का ठेका शासनादेश के विरुद्ध जाकर आवंटित कर दिया। आरोप है कि नगर पंचायत अध्यक्ष को गुमराह कर और नियमों की अनदेखी कर टेंडर की प्रक्रिया पूरी की गई। यही नहीं, विद्युत उपकरणों की सप्लाई में भी भारी अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता शमशाद अहमद के अनुसार, जो कार्य 6.50 लाख रुपये की लागत में संपन्न हो सकता था, उसके लिए 16.50 लाख रुपये का टेंडर जारी किया गया। आरोप है कि मौके पर गुणवत्ता के मानक पूरे नहीं किए गए और घटिया माल की आपूर्ति कर सरकारी धन की बंदरबांट कर दी गयी। जांच की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल

वर्तमान में कोटिया के विरुद्ध एडीएम रुद्रपुर और एसडीएम सितारगंज के कार्यालयों में तीन अलग-अलग जांचें विचाराधीन हैं। लेकिन शिकायतकर्ताओं को अंदेशा है कि राकेश कोटिया के ऊंचे रसूख के चलते ये जांचें भी पिछली बार की तरह महज ‘खानापूर्ति’ साबित होंगी। सामाजिक कार्यकर्ता शमशाद अहमद ने एक बार फिर उच्चाधिकारियों और मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराकर निष्पक्ष जांच और आरोपी अधिकारी की नियुक्ति निरस्त करने की पुरजोर मांग की है। अब देखना यह है कि धामी सरकार का ‘जीरो टॉलरेंस’ का चाबुक इस दागी अधिकारी पर चलता है या फिर फाइलों में दफन होने का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा।।

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