“जमानत की टेंशन मत लो… विधायक आपका है, मेयर आपका है, सरकार आपकी है, पुलिस-प्रशासन से बात हो गई है, अदालत आपकी है” — छात्रसंघ चुनाव के दौरान दिए गए कथित बयान की कड़ी निंदा
छात्रसंघ चुनाव के दौरान भाजपा के एक मेयर द्वारा कथित रूप से दिए गए इस बयान ने लोकतंत्र, कानून के शासन और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
«“जमानत की टेंशन मत लो। विधायक आपका है, मेयर आपका है, सरकार आपकी है। पुलिस प्रशासन से बात हो गई है। पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है। अदालत आपकी है।”»
यदि यह बयान इसी आशय में दिया गया है, तो यह अत्यंत गंभीर और चिंताजनक विषय है। छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और ऐसे समय में किसी जनप्रतिनिधि द्वारा यह संदेश दिया जाना कि सरकार, पुलिस-प्रशासन और यहां तक कि अदालत भी ‘आपकी’ है, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
क्या पुलिस-प्रशासन किसी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि की निजी संपत्ति है? क्या न्यायालय किसी विधायक, मेयर या सरकार के अधीन हैं? क्या किसी व्यक्ति को राजनीतिक संरक्षण के आधार पर कानून और न्यायिक प्रक्रिया से बेफिक्र रहने का भरोसा दिया जा सकता है?
भारत का लोकतंत्र संविधान और कानून के शासन पर आधारित है। पुलिस प्रशासन का दायित्व कानून के अनुसार कार्य करना है और न्यायालय स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं हैं। किसी भी व्यक्ति को यह संदेश नहीं दिया जाना चाहिए कि राजनीतिक पहुंच के कारण उसे कानून से विशेष संरक्षण प्राप्त है।
विशेष रूप से छात्रसंघ चुनाव के दौरान इस प्रकार का कथित बयान छात्रों और युवा मतदाताओं के बीच चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर गलत संदेश पैदा कर सकता है। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय लोकतांत्रिक मूल्यों की पाठशाला हैं; वहां भय, दबाव या राजनीतिक संरक्षण की भावना के बजाय स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष चुनाव और कानून के सम्मान का वातावरण होना चाहिए।
हम इस कथित बयान की कड़ी निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि बयान की वास्तविक रिकॉर्डिंग एवं संदर्भ की निष्पक्ष जांच की जाए। यदि जांच में संवैधानिक संस्थाओं पर प्रभाव डालने अथवा चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का कोई प्रयास सामने आता है, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाए।
सत्ता किसी की निजी संपत्ति नहीं है।
पुलिस किसी नेता की नहीं, कानून की है।
प्रशासन किसी व्यक्ति का नहीं, संविधान का है।
और अदालत किसी सरकार की नहीं, न्याय की है।
छात्रसंघ चुनाव लोकतंत्र की पहली पाठशाला हैं—इन्हें राजनीतिक संरक्षण और दबाव से नहीं, बल्कि संविधान और कानून की मर्यादा से संचालित होना चाहिए।।

