ऊधम सिंह नगर

विजिलेंस की कार्रवाई निष्पक्ष हो, शिकायतकर्ता की मंशा की भी हो गहन जांच झूठी शिकायतों से निर्दोष कर्मचारियों की प्रतिष्ठा पर पड़ता है गहरा असर

विजिलेंस की कार्रवाई निष्पक्ष हो, शिकायतकर्ता की मंशा की भी हो गहन जांच

झूठी शिकायतों से निर्दोष कर्मचारियों की प्रतिष्ठा पर पड़ता है गहरा असर

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान उत्तराखंड में विजिलेंस (सतर्कता अधिष्ठान) का गठन भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाने और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और जो अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाए जाएं, उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी कार्रवाई से पहले सभी तथ्यों और परिस्थितियों की निष्पक्ष एवं गहन जांच की जाए।

हाल के एक मामले में विजिलेंस द्वारा पकड़े गए एक कर्मचारी को बाद में छोड़ना पड़ा। ऐसे मामले यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि कहीं-कहीं शिकायतों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश, दबाव बनाने या निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए तो नहीं किया जा रहा। यदि ऐसा है, तो यह केवल संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के साथ ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के साथ भी अन्याय है।

विजिलेंस को प्रत्येक शिकायत को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन उतनी ही गंभीरता से शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता, उसकी पृष्ठभूमि और शिकायत के पीछे की मंशा का भी परीक्षण किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पहले से विवादों में रहा हो, ब्लैकमेलिंग जैसे आरोपों का सामना कर चुका हो या किसी निजी हित के कारण शिकायत कर रहा हो, तो ऐसे पहलुओं की भी जांच होना आवश्यक है। इसका उद्देश्य किसी शिकायत को खारिज करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों का सामना न करना पड़े।

कई बार यह आरोप भी सामने आते हैं कि कुछ लोग ठेके, भुगतान या अन्य निजी हितों को लेकर अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए शिकायतों का सहारा लेते हैं।यदि उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तो वे शिकायत या अन्य माध्यमों से संबंधित अधिकारी या कर्मचारी को विवादों में घसीटने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होती है, ताकि किसी भी प्रकार के षड्यंत्र या दुर्भावनापूर्ण शिकायत का शिकार कोई निर्दोष व्यक्ति न बने।

यह भी समझना जरूरी है कि विजिलेंस द्वारा किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध की गई कार्रवाई का प्रभाव केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यदि किसी कर्मचारी को सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ा जाता है, तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। उसके परिवार, माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चों, रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों को भी समाज में मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई बार बाद में व्यक्ति निर्दोष साबित हो जाए, तब भी उसकी प्रतिष्ठा को हुई क्षति की पूरी भरपाई संभव नहीं हो पाती।

इसलिए यह आवश्यक है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया जाए और यह भी देखा जाए कि शिकायतकर्ता का उद्देश्य क्या है। क्या शिकायत वास्तव में जनहित और भ्रष्टाचार के खिलाफ है, या उसके पीछे व्यक्तिगत बदला, आर्थिक लाभ, दबाव बनाने अथवा किसी अन्य प्रकार का स्वार्थ छिपा है। इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच से ही सही और न्यायसंगत निर्णय तक पहुंचा जा सकता है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वास्तविक भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई न बरती जाए। जो दोषी हैं, उनके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जो निर्दोष हैं, उन्हें झूठे आरोपों और अनावश्यक सामाजिक अपमान से बचाना भी कानून और न्याय व्यवस्था की समान रूप से जिम्मेदारी है।

विजिलेंस जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी और अधिक मजबूत होगी, जब उनकी प्रत्येक कार्रवाई निष्पक्ष, साक्ष्य-आधारित और पूरी तरह पारदर्शी होगी। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि दोषी को दंड मिले, लेकिन किसी निर्दोष को बिना पर्याप्त प्रमाण के दंड या सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े। इसलिए आवश्यक है कि हर शिकायत पर कार्रवाई से पहले तथ्यों, साक्ष्यों, शिकायतकर्ता की मंशा और पूरे घटनाक्रम की गहन एवं निष्पक्ष जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।।

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