मीना राय ने ऐपण कला को बनाया रोजगार का जरिया पारंपरिक कला से आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं
मीना राय ने ऐपण कला को बनाया रोजगार का जरिया
पारंपरिक कला से आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
उत्तराखंड की पारंपरिक और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर ऐपण कला को आजीविका का माध्यम बनाकर ग्राम पंचायत चौड़ीराय की निवासी श्रीमती मीना राय आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल बनकर उभरी हैं।
बचपन से ही ऐपण कला में रुचि और दक्षता रखने वाली मीना राय के पास हुनर तो था, लेकिन संसाधनों और सही मार्गदर्शन के अभाव में वह इसे व्यवसाय का रूप नहीं दे पा रही थीं उनके जीवन में बदलाव तब आया जब वे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित ‘जय माँ काली स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ीं। यह समूह ग्रामोत्थान परियोजना के तहत मनसा देवी संकुल संघ द्वारा संचालित किया जा रहा है।
समूह से जुड़ने के बाद मीना को न केवल सामूहिक सहयोग मिला, बल्कि स्वरोजगार के नए अवसरों की जानकारी भी प्राप्त हुई।
ग्रामोत्थान परियोजना, जो अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष एवं केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित है, ने उनके उद्यम को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परियोजना के तहत आयोजित बैठकों के माध्यम से उन्हें लघु उद्यम स्थापना योजना की जानकारी मिली। उनकी लगन और आत्मनिर्भर बनने के संकल्प को देखते हुए परियोजना टीम ने ऐपण कला आधारित उद्यम के लिए उनका चयन किया और सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कराईं।
उद्यम स्थापना के लिए मीना राय को कुल 1 लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई, जिसमें 30,000 रुपये अनुदान, 50,000 रुपये बैंक ऋण और 20,000 रुपये स्वयं का अंशदान शामिल है।
अपने कार्य की शुरुआत में मीना ने पारंपरिक ऐपण डिजाइनों को आधुनिक रूप देते हुए पूजा थाली, वॉल हैंगिंग, उपहार सामग्री और नाम पट्टिका जैसे आकर्षक उत्पाद तैयार किए। उनकी उत्कृष्ट कलाकारी और गुणवत्ता के कारण स्थानीय बाजार में उन्हें जल्द ही पहचान मिल गई और उत्पादों की मांग लगातार बढ़ने लगी।
आज मीना राय अपने इस स्वरोजगार से प्रतिमाह लगभग 5,000 से 6,000 रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं, बल्कि अपनी पारंपरिक कला को संरक्षित करते हुए अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं।

