बेसहारा पशु को बचाने के प्रयास में सिडकुल कर्मचारी घायल, पैर टूटा — प्रशासन की अनदेखी पर उठे सवाल
बेसहारा पशु को बचाने के प्रयास में सिडकुल कर्मचारी घायल, पैर टूटा — प्रशासन की अनदेखी पर उठे सवाल
सड़क पर आवारा पशु, फिर हादसा: कर्मचारी घायल, प्रशासन बेपरवाह
पशु बचाने में टूटा पैर, कौन लेगा जिम्मेदारी?
रुद्रपुर में आवारा पशुओं का कहर, सिडकुल कर्मी गंभीर घायल
सड़कों पर मौत का खतरा: बेसहारा पशु से टकराकर कर्मचारी घायल
पशु छोड़ने वालों पर ढिलाई, भुगत रहे राहगीर — बड़ा हादसा
आवारा पशु ने बढ़ाया खतरा, सिडकुल कर्मचारी हादसे का शिकार
सड़क पर पशु, अस्पताल में इंसान — लापरवाही पर उठे सवाल
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
रुद्रपुर। शहर में आज सुबह एक दर्दनाक सड़क हादसा सामने आया, जिसमें एक सिडकुल कर्मचारी बेसहारा पशु को बचाने के प्रयास में गंभीर रूप से घायल हो गया। हादसे में कर्मचारी का पैर टूट गया, जिसे तत्काल उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, सड़क पर अचानक आए बेसहारा पशु को बचाने के दौरान कर्मचारी का वाहन अनियंत्रित हो गया, जिससे यह दुर्घटना हुई। क्षेत्र में इस प्रकार की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिनका मुख्य कारण सड़कों पर खुलेआम घूम रहे बेसहारा पशु हैं।गौरतलब है कि रुद्रपुर में छोटी-बड़ी सड़क दुर्घटनाओं में बेसहारा पशुओं की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। ये पशु बिना किसी नियंत्रण के सड़कों पर घूमते रहते हैं और अचानक दिशा बदलने से वाहन चालकों के लिए गंभीर खतरा बन जाते हैं। नतीजतन, आए दिन हादसे हो रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर ठोस कदम उठाने में विफल साबित हो रहा है। लोगों का कहना है कि पशुपालक दूध देने तक तो पशुओं को रखते हैं, लेकिन बाद में उन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं, जिससे समस्या और विकराल होती जा रही है। नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि बेसहारा पशुओं के लिए ठोस नीति बनाई जाए और उन्हें सड़कों से हटाकर सुरक्षित स्थानों पर रखा जाए, ताकि लगातार हो रही दुर्घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
बेसहारा पशुओं से बढ़ते सड़क हादसे: मुआवजा नीति से माइक्रोचिप तक समाधान की तलाश
देशभर में बेसहारा पशुओं—विशेषकर गाय, बैल और नीलगाय—के कारण सड़क हादसों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। हाईवे से लेकर शहरी सड़कों तक ये पशु दुर्घटनाओं की बड़ी वजह बनते जा रहे हैं, जिससे आमजन की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बीच, हरियाणा सरकार ने बेसहारा पशुओं के हमले से होने वाली मृत्यु या दिव्यांगता की स्थिति में आर्थिक सहायता देने की नीति लागू की है। इस योजना के तहत पीड़ित या उनके परिजन घटना के 90 दिनों के भीतर आवेदन कर मुआवजा प्राप्त कर सकते हैं। वहीं, प्रशासन ने ऐसे पशुपालकों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही है, जो दूध न देने पर पशुओं को सड़कों पर छोड़ देते हैं। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है, ताकि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।
दूसरी ओर, पंजाब में पिछले 11 वर्षों से वसूले जा रहे गौ-सेस को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। करीब 118 करोड़ रुपये के उपयोग का स्पष्ट हिसाब न मिलने पर सरकार और संबंधित विभागों पर सवाल उठ रहे हैं। पशु प्रबंधन के मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। देश में लगभग 50 लाख छुट्टा गौवंश होने का अनुमान है, जबकि गौशालाओं में जगह की कमी के चलते इन पशुओं को समुचित आश्रय नहीं मिल पा रहा है। इससे समस्या और अधिक जटिल होती जा रही है। इसी बीच, तकनीकी समाधान के तौर पर पशुओं की पहचान के लिए नई पहल पर काम शुरू हुआ है। पारंपरिक कान टैग की जगह अब पशुओं के शरीर में माइक्रोचिप लगाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे उनके मालिकों की पहचान कर जिम्मेदारी तय की जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सख्त कानूनों के साथ प्रभावी क्रियान्वयन और आधुनिक तकनीक का समावेश नहीं होगा, तब तक बेसहारा पशुओं की समस्या और उससे जुड़े हादसों पर नियंत्रण पाना मुश्किल रहेगा।।

