हरिद्वार से निकली प्रशासनिक सोच, जो पूरे प्रदेश के लिए बनी मिसाल
हरिद्वार से निकली प्रशासनिक सोच, जो पूरे प्रदेश के लिए बनी मिसाल
एआरटीओ निखिल शर्मा का ‘प्रेस डे’ फैसला: कार्यसंस्कृति, पारदर्शिता और संवेदनशील प्रशासन का नया अध्याय
– ‘प्रेस डे’ का फैसला: एक दिन में समाधान, महीनों की दौड़ पर विराम
– बिना नियम तोड़े बनी सुविधा ,पारदर्शिता और अनुशासन का संतुलित मॉडल
– मीडिया और प्रशासन के बीच सेतु: संवाद, सम्मान और समन्वय की नई संस्कृति
– एआरटीओ निखिल शर्मा का मॉडल – उत्तराखंड ही नहीं, देश भर के लिए प्रशासनिक मिसाल
अभिषेक शर्मा
हरिद्वार। जब प्रशासनिक निर्णय सिर्फ फाइलों तक सीमित न रहकर जनसुविधा, पारदर्शिता और व्यवहारिकता का उदाहरण बन जाएँ, तो ऐसे फैसले स्वतः ही इतिहास रच देते हैं। हरिद्वार में सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रशासन) निखिल शर्मा द्वारा लिया गया एक ऐसा ही निर्णय आज पूरे प्रदेश के परिवहन विभाग के लिए नया मानक स्थापित कर रहा है।
कार्यालयी कार्यों के दौरान मीडिया प्रतिनिधियों एवं आम नागरिकों को बार-बार आने-जाने, समय की बर्बादी और अनावश्यक असमंजस से बचाने के उद्देश्य से एआरटीओ निखिल शर्मा ने हर माह के चौथे शनिवार को ‘प्रेस डे’ घोषित करने का अभिनव और दूरदर्शी निर्णय लिया है। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक सूझ-बूझ का परिचायक है, बल्कि यह दर्शाता है कि एक अधिकारी यदि चाहे तो व्यवस्था के भीतर रहकर भी मानवीय, संवेदनशील और व्यावहारिक प्रशासन दे सकता है।
‘प्रेस डे’ के माध्यम से अब प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया से जुड़े अधिकृत प्रतिनिधि निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने विषय, समस्याएँ एवं आवेदन एक ही दिन में समन्वित रूप से प्रस्तुत कर सकेंगे। इससे जहाँ एक ओर कार्यालय का नियमित कार्य प्रभावित नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर मीडिया और प्रशासन के बीच संवाद का एक सशक्त, सुव्यवस्थित और सम्मानजनक मंच भी विकसित होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस निर्णय में किसी भी नियम, अधिनियम, शुल्क, समय-सीमा या प्रक्रिया में कोई ढील नहीं दी गई है। न ही किसी व्यक्ति या वर्ग को विशेषाधिकार देने की कोई मंशा है। यह साफ दर्शाता है कि यह फैसला सुविधा के नाम पर छूट नहीं, बल्कि व्यवस्था के नाम पर सुधार है।
एआरटीओ निखिल शर्मा के द्वारा उठाया गया यह कदम इस बात का प्रमाण है कि वे केवल आदेश देने वाले अधिकारी नहीं, बल्कि प्रक्रिया को समझने, समस्याओं को महसूस करने और व्यवस्थित समाधान करने में सक्षम है । उन्होंने यह दिखा दिया कि प्रशासनिक एकाग्रता का अर्थ जनता से दूरी नहीं, बल्कि संतुलन और समन्वय है।
आज जब अक्सर सरकारी तंत्र पर असंवेदनशील होने के आरोप लगते हैं, ऐसे समय में हरिद्वार से उठी यह पहल पूरे उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश के अन्य परिवहन कार्यालयों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि इस मॉडल को प्रदेश स्तर पर अपनाया जाए, तो परिवहन विभाग की छवि, कार्यप्रणाली और जनविश्वास में ऐतिहासिक सुधार संभव है।।

