Wednesday, September 30, 2026
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ऊधम सिंह नगर

पार्ट-2: तीन अधिकारी, एक गृह जनपद और एक ही जिला—संयोग या व्यवस्था पर सवाल?

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

रुद्रपुर। ग्रामीण निर्माण विभाग में अल्मोड़ा गृह जनपद वाले तीन अधिकारियों की एक साथ ऊधमसिंह नगर में तैनाती का मामला अब केवल संयोग की चर्चा तक सीमित नहीं है। विभागीय रिकॉर्ड में एक अधिशासी अभियंता और दो सहायक अभियंता एक ही जिले में तैनात दिखाई दे रहे हैं। तीनों की जिम्मेदारियां भी विभाग के महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों से जुड़ी हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह तैनाती सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है या इसके पीछे कोई विशेष प्रशासनिक आधार रहा है।यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सिर्फ एक ही गृह जनपद के होने और एक ही जिले में तैनाती के आधार पर किसी तरह की अनियमितता या मिलीभगत का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यही स्थिति अब एक दूसरे सवाल को जन्म देती है—क्या संबंधित अधिकारियों की तैनाती, उनके कार्यक्षेत्र और उनके कार्यकाल में हुए निर्माण कार्यों की रिकॉर्ड आधारित स्वतंत्र पड़ताल हुई है?

असली सवाल तैनाती से आगे का

ग्रामीण निर्माण विभाग की वेबसाइट पर वर्ष 2026-27 से संबंधित स्थानांतरण और पात्रता के दस्तावेज सार्वजनिक किए गए हैं। विभाग की ओर से स्थानांतरण सत्र से संबंधित पात्रता सूची भी जारी की गई है।

ऐसे में तीनों अधिकारियों के मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनकी तैनाती किस आदेश के तहत हुई, उनका स्थानांतरण किस आधार पर हुआ और क्या उनकी पदस्थापना संबंधित नियमों एवं प्रक्रिया के अनुरूप है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल उनके कार्यकाल के दौरान हुए कामकाज का है।

कितने काम, कितनी रकम और किनके नाम?

जांच यदि आगे बढ़ती है तो संबंधित अवधि में स्वीकृत निर्माण कार्यों की सूची सामने लाई जा सकती है। इसके बाद प्रत्येक कार्य का टेंडर, कार्यादेश, स्वीकृत लागत, वास्तविक भुगतान, माप पुस्तिका यानी एमबी, गुणवत्ता जांच और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र देखा जा सकता है।

सवाल यह भी है कि संबंधित अधिकारियों के कार्यकाल में—

कितने निर्माण कार्य स्वीकृत हुए?

कितने कार्य पूरे हुए?

कितनी धनराशि का भुगतान हुआ?

किन ठेकेदारों या फर्मों को काम मिला?

क्या किसी ठेकेदार को बार-बार काम मिला?

और सबसे अहम—क्या सभी प्रक्रियाएं रिकॉर्ड में निर्धारित नियमों के अनुरूप दिखाई देती हैं?

इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि विभागीय अभिलेखों से मिल सकता है।

एमबी से भुगतान तक हो सकती है पूरी पड़ताल

निर्माण कार्यों में माप पुस्तिका यानी एमबी महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। मौके पर कितना काम हुआ और उसके आधार पर कितना भुगतान किया गया, इसकी जानकारी संबंधित रिकॉर्ड से मिल सकती है।

इसलिए यदि विभाग इन अधिकारियों के कार्यकाल के प्रमुख निर्माण कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराए तो एमबी, बिल, भुगतान आदेश, साइट निरीक्षण रिपोर्ट और गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट का आपस में मिलान किया जा सकता है। ऐसी जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि कागजों में दर्ज कार्य और मौके पर किए गए कार्य में कोई अंतर है या नहीं।ठेकेदारों का रिकॉर्ड भी खोल सकता है कई सवाल

जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ठेकेदारवार रिकॉर्ड हो सकता है। संबंधित अवधि में किस फर्म या ठेकेदार को कितने कार्य मिले और कितनी धनराशि का भुगतान हुआ, इसका वर्षवार विवरण तैयार किया जाए तो विभागीय कार्य आवंटन का पैटर्न सामने आ सकता है।

यह पैटर्न अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं होगा। लेकिन यदि किसी कार्य में नियमों से हटकर प्रक्रिया अपनाए जाने की बात सामने आती है तो उसी आधार पर आगे जांच की जा सकती है।

क्या तीनों की तैनाती की परिस्थितियां समान थीं?

एक और सवाल प्रशासनिक स्तर का है। क्या तीनों अधिकारियों की तैनाती अलग-अलग समय और अलग-अलग आदेशों से हुई या किसी एक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुई? क्या उनकी तैनाती के पीछे विभागीय आवश्यकता दर्ज है? क्या संबंधित पदों पर अन्य अधिकारियों के विकल्प उपलब्ध थे?

इन सवालों के जवाब तैनाती आदेश और विभागीय पत्रावलियों से ही मिल सकते हैं।

इसलिए इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज तीनों अधिकारियों के तैनाती एवं स्थानांतरण आदेश, उनकी सेवा अवधि और संबंधित पदों की जिम्मेदारियों से जुड़े अभिलेख हो सकते हैं।

जांच हुई तो सामने आएगा ‘संयोग’ का सच

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि तीनों अधिकारियों की एक साथ मौजूदगी के पीछे कोई अनुचित समीकरण है। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि एक ही गृह जनपद के तीन अधिकारियों का एक ही जिले में महत्वपूर्ण पदों पर होना एक ऐसा तथ्य है, जिसकी प्रशासनिक पारदर्शिता के नजरिये से पड़ताल की जा सकती है।

यदि तैनाती प्रक्रिया नियमों के अनुरूप है और संबंधित अधिकारियों के कार्यकाल में हुए निर्माण कार्यों में भी सभी प्रक्रियाएं सही पाई जाती हैं तो उठ रहे सवालों का जवाब रिकॉर्ड से मिल जाएगा।

वहीं, यदि जांच में किसी कार्य में प्रक्रिया संबंधी कमी, गुणवत्ता से जुड़ी आपत्ति या वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो संबंधित मामले में नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

अब सीधे विभाग से सवाल

1. तीनों अधिकारियों की ऊधमसिंह नगर में तैनाती किन आदेशों के तहत हुई?

2. क्या तीनों तैनातियों के समय संबंधित पदों के लिए निर्धारित पात्रता और स्थानांतरण प्रक्रिया का पालन हुआ?

3. इनके कार्यकाल में कितने निर्माण कार्य स्वीकृत हुए और उनकी कुल लागत कितनी रही?

4. इन कार्यों में किन ठेकेदारों और फर्मों को काम मिला?

5. संबंधित कार्यों की एमबी और भुगतान अभिलेखों की स्वतंत्र जांच हुई या नहीं?

6. क्या इन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता का परीक्षण निर्धारित मानकों के अनुसार हुआ?

7. क्या किसी निर्माण कार्य को लेकर विभाग के पास शिकायत, आपत्ति या जांच रिपोर्ट उपलब्ध है?

8. क्या विभाग तीनों अधिकारियों के कार्यकाल में हुए प्रमुख निर्माण कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराने पर विचार करेगा?

सवाल बड़ा है, जवाब रिकॉर्ड से चाहिए

मामला किसी अधिकारी को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रशासनिक स्थिति की पारदर्शी पड़ताल का है जिसने सवाल खड़े किए हैं। तीनों अधिकारियों की तैनाती का आधार क्या था और उनके कार्यकाल में विभाग ने किस तरह काम किया—इन दोनों सवालों का जवाब यदि तैनाती आदेशों और निर्माण कार्यों के रिकॉर्ड के साथ सार्वजनिक हो जाए तो स्थिति काफी हद तक साफ हो सकती है।

फिलहाल गेंद विभाग के पाले में है। तैनाती आदेश बताएंगे कि तीनों यहां कैसे पहुंचे और निर्माण कार्यों के रिकॉर्ड बताएंगे कि उनके कार्यकाल में क्या हुआ अब देखना यह है कि विभाग इन सवालों का जवाब केवल प्रशासनिक तर्क से देता है या दस्तावेजों के साथ।।

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