SIR के बीच मतदाता सूची में अंतर पर उठे सवाल, पारदर्शिता की मांग
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
देहरादून। उत्तराखंड में चल रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मतदाता सूची में सामने आए आंकड़ों पर सवाल उठने लगे हैं। कुर्मी महासभा उत्तराखंड की प्रदेश अध्यक्ष एवं अधिवक्ता शिवांगी गंगवार ने निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही दावे और आपत्तियों का समयबद्ध एवं निष्पक्ष निस्तारण किए जाने की मांग की है।
शिवांगी गंगवार ने कहा कि 14 जुलाई को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में 71,33,785 मतदाता दर्ज किए गए हैं, जबकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव की अंतिम मतदाता सूची में करीब 79.58 लाख मतदाता दर्ज थे। दोनों आंकड़ों में लगभग 8.25 लाख का अंतर सामने आया है। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड जांच के दायरे में आए हैं, ऐसे में पूरी प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए उन्होंने Form-6, Form-7 और Form-8 के माध्यम से प्राप्त आवेदनों के निस्तारण को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रत्येक पात्र नागरिक के दावे का निर्धारित समय सीमा के भीतर निष्पक्ष निस्तारण किस प्रकार सुनिश्चित किया जा रहा है।
गंगवार ने विशेष रूप से Form-7 के मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन प्रकरणों को ‘ineligible’ श्रेणी में रखा गया है, उनमें संबंधित नागरिकों को अपना पक्ष रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक कारणों से सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची महज एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मताधिकार के प्रयोग का आधार है। इसलिए अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले सभी दावों और आपत्तियों का नियमानुसार निस्तारण किया जाना आवश्यक है।
अधिवक्ता शिवांगी गंगवार ने निर्वाचन विभाग से विधानसभा-वार और बूथ-वार आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह जानकारी सामने आनी चाहिए कि कितने नाम जोड़े गए, कितने नाम हटाए गए, कितनी आपत्तियां प्राप्त हुईं और उनमें से कितने मामलों का निस्तारण किया गया
निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार उत्तराखंड में अंतिम मतदाता सूची 3 अक्टूबर को प्रकाशित की जानी प्रस्तावित है। वहीं दावे और आपत्तियों के निस्तारण की समयसीमा 28 सितंबर तक बढ़ाई गई है। ऐसे में अंतिम सूची जारी होने से पहले लंबित मामलों के निस्तारण को लेकर निगरानी बनी हुई है।
गंगवार ने कहा कि SIR की समयसीमा को लेकर संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा हो सकती है, लेकिन केवल मतदाता पुनरीक्षण की समयसीमा बढ़ने से राष्ट्रपति शासन स्वतः लागू नहीं होता उन्होंने कहा कि संवैधानिक स्थिति का निर्धारण निर्वाचन प्रक्रिया और शासन-व्यवस्था के संचालन में उत्पन्न वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है। उन्होंने निर्वाचन विभाग से मांग की कि पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के साथ SIR से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र नागरिक को मताधिकार से वंचित न होना पड़े।।

