ऊधम सिंह नगर

2019 में लालकिले से गूंजा था संकल्प, 2026 में उधम सिंह नगर प्यासा क्यों ? “हर घर जल” पर सिस्टम से जवाब मांगता सच

2019 में लाल किला से गूंजा था संकल्प, 2026 में उधम सिंह नगर प्यासा क्यों? “हर घर जल” पर सिस्टम से जवाब मांगता सच

सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

15 अगस्त 2019 को नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से देश के नाम संबोधन में एक ऐतिहासिक घोषणा की थी—देश के हर ग्रामीण घर तक नल से स्वच्छ पेयजल पहुंचाया जाएगा। इसी के साथ शुरू हुआ जल जीवन मिशन, जिसका लक्ष्य था कि वर्ष 2024 तक हर गांव, हर घर में “हर घर जल” के तहत कार्यात्मक नल कनेक्शन उपलब्ध कराया जाए।

यह केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि इसे सामाजिक और जीवन-स्तर में बदलाव लाने वाली क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया गया। उस समय आंकड़े बताते थे कि देश के करोड़ों ग्रामीण परिवार, विशेषकर महिलाएं, प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर थीं। जलजनित बीमारियां गांवों में आम थीं। ऐसे में इस मिशन को महिलाओं के सम्मान, बच्चों के स्वास्थ्य और ग्रामीण भारत के सशक्तिकरण से जोड़ा गया।केंद्र और राज्यों की साझेदारी में हजारों करोड़ रुपये स्वीकृत हुए। पाइपलाइन बिछाने, ओवरहेड टंकियां बनाने, बोरिंग कराने और घर-घर कनेक्शन देने के लिए समयसीमा तय की गई। इसे मिशन मोड में लागू करने की बात कही गई, ताकि तय समय 2024 तक लक्ष्य पूरा हो सके।

लेकिन अब 2026 आ चुका है। सवाल यह है कि उत्तराखंड के तराई क्षेत्र का आर्थिक रूप से मजबूत जिला उधम सिंह नगर आज भी पूरी तरह “हर घर जल” से संतृप्त क्यों नहीं है? कागजों में कई गांवों को “संतृप्त” घोषित कर दिया गया, पर जमीनी हकीकत अलग कहानी कहती है।

कई गांवों में पाइपलाइन अधूरी पड़ी है। कहीं टंकी बनकर तैयार है लेकिन उसमें पानी नहीं चढ़ता। कहीं कनेक्शन तो दे दिए गए, पर सप्लाई नियमित नहीं है। कई घरों में नल लगे हैं, पर वे महीनों से सूखे हैं। महिलाएं अब भी हैंडपंप या निजी बोरिंग पर निर्भर हैं।

यदि मूल समयसीमा 2024 थी और 2025 भी बीत गया, तो 2026 में देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या बजट समय पर जारी नहीं हुआ? यदि नहीं हुआ तो प्रस्ताव समय पर क्यों नहीं भेजे गए? यदि बजट मिला, तो क्या उसका उपयोग पूर्ण रूप से हुआ? और यदि उपयोग हुआ, तो परिणाम जमीन पर क्यों नहीं दिख रहे?

उधम सिंह नगर कोई दुर्गम पहाड़ी जिला नहीं है जहां भौगोलिक चुनौतियां काम में बाधा बनती हों। यह उत्तराखंड का औद्योगिक और कृषि दृष्टि से सशक्त क्षेत्र है। यहां संसाधनों और पहुंच की कमी का तर्क ज्यादा देर तक नहीं टिकता। ऐसे में सवाल सीधे प्रशासनिक तंत्र और मॉनिटरिंग व्यवस्था पर खड़े होते हैं।

क्या कार्यों की निगरानी कमजोर रही?

क्या ठेकेदारों को समयसीमा के पालन के लिए सख्ती से नहीं रोका गया?

क्या प्रगति रिपोर्टों में वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर पेश की गई?

यह मामला केवल विकास कार्य की देरी नहीं है। यह स्वास्थ्य, स्वच्छता और महिलाओं की गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। स्वच्छ जल की अनुपलब्धता सीधे तौर पर डायरिया, टाइफाइड और अन्य जलजनित रोगों का खतरा बढ़ाती है। जब तक घर-घर नियमित और सुरक्षित जल आपूर्ति नहीं होगी, तब तक “हर घर जल” का नारा अधूरा ही रहेगा।

अब आवश्यकता है पूर्ण पारदर्शिता की।

जिले में स्वीकृत कुल बजट, अब तक हुए खर्च, अधूरे कार्यों की सूची, और जिम्मेदार अधिकारियों व एजेंसियों के नाम सार्वजनिक किए जाएं। सामाजिक ऑडिट कराया जाए। ग्राम स्तर पर वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र जांच हो। जहां लापरवाही साबित हो, वहां जवाबदेही तय कर कठोर कार्रवाई की जाए।

2019 में लिया गया संकल्प केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि देश की जनता से किया गया वादा था। 2026 में यदि उधम सिंह नगर के घरों तक पानी पूरी तरह नहीं पहुंचा है, तो यह केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न है।

अब वक्त है कि इस आईने को देखने से बचा न जाए बल्कि साफ-साफ देखा जाए, स्वीकार किया जाए और सुधारा भी जाए तभी “हर घर जल” का सपना वास्तव में साकार हो पाएगा।

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