बार काउंसिल के मनोनयन पर उठे सवाल, प्रतिनिधित्व या पहुंच की राजनीति? चुनाव में सर्वाधिक मत पाने वाली महिला अधिवक्ताओं को दरकिनार करने पर उठे सवाल, मनोनयन के आधार और चयन प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग
बार काउंसिल के मनोनयन पर उठे सवाल, प्रतिनिधित्व या पहुंच की राजनीति?
चुनाव में सर्वाधिक मत पाने वाली महिला अधिवक्ताओं को दरकिनार करने पर उठे सवाल, मनोनयन के आधार और चयन प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
नैनीताल। उत्तराखंड बार काउंसिल में दो महिला अधिवक्ताओं के मनोनयन के बाद चयन प्रक्रिया को लेकर अधिवक्ता समुदाय के एक वर्ग में सवाल उठने लगे हैं। अधिवक्ताओं ने मनोनयन की प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मानदंड स्पष्ट किए जाने की मांग उठाई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बार काउंसिल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की पहल को अधिवक्ता समुदाय में व्यापक रूप से सकारात्मक कदम माना जा रहा है। हालांकि, इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि मनोनयन के लिए किन मानदंडों को आधार बनाया गया और क्या इन मानदंडों को सार्वजनिक किया गया है।
चर्चा का प्रमुख बिंदु यह है कि चुनाव में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाली महिला अधिवक्ताओं में शामिल एडवोकेट शिवांगी गंगवार को मनोनयन में स्थान नहीं मिला ऐसे में अधिवक्ता समुदाय में सवाल उठ रहा है कि व्यापक जनसमर्थन हासिल करने के बावजूद उनके नाम को दरकिनार करने का आधार क्या रहा। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि मनोनयन के लिए चुनावी जनसमर्थन से अलग कोई मानदंड निर्धारित किया गया था, तो उसे स्पष्ट और सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि चयन प्रक्रिया को लेकर किसी प्रकार की आशंका न रहे।
मनोनीत सदस्यों में से एक नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वर्तमान सांसद के परिवार से जुड़ा होने तथा दूसरे नाम को लेकर सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था से निकटता की चर्चाएं भी अधिवक्ता समुदाय में सामने आ रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में अधिवक्ताओं का कहना है कि चयन के स्पष्ट मानदंड सामने आने से इस तरह की आशंकाओं और चर्चाओं पर विराम लगाया जा सकता है।
बार काउंसिल अधिवक्ताओं की स्वायत्त और वैधानिक संस्था है। ऐसे में यदि उसके निर्णयों को लेकर राजनीतिक पहुंच या व्यक्तिगत संबंधों के प्रभाव की धारणा बनने लगे, तो यह संस्था की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता के लिए चिंता का विषय हो सकता है। अधिवक्ताओं का कहना है कि चयन प्रक्रिया जितनी स्पष्ट और पारदर्शी होगी, बार काउंसिल की संस्थागत विश्वसनीयता उतनी ही मजबूत होगी उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल 8 अक्टूबर 2026 को समाप्त होना प्रस्तावित है। ऐसे में उनके कार्यकाल के दौरान किए गए मनोनयन को लेकर चर्चाएं भी हो रही हैं। हालांकि, केवल कार्यकाल की स्थिति के आधार पर किसी व्यक्तिगत उद्देश्य या हित का आरोप लगाना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि मनोनयन की प्रक्रिया और उसके आधार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाएं, ताकि किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे।
अधिवक्ताओं के बीच उठ रहे सवालों का केंद्र महिला प्रतिनिधित्व का विरोध नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व तय करने की प्रक्रिया है। उनका कहना है कि महिला प्रतिनिधित्व का उद्देश्य सक्षम और योग्य महिला अधिवक्ताओं को संस्थागत भागीदारी देना है, इसलिए पात्रता, योग्यता, अनुभव और चयन के अन्य मानदंड स्पष्ट होने चाहिए फिलहाल, मनोनयन को लेकर उठी बहस ने बार काउंसिल की स्वायत्तता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मर्यादा को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित स्तर से मनोनयन के आधार और चयन प्रक्रिया को लेकर क्या स्पष्टीकरण सामने आता है।।
