10 दुकानें टूटीं, फिर भी रोडवेज टर्मिनल का रास्ता साफ नहीं 51 दुकानों के कब्जे में फंसी परियोजना, अधूरी कार्रवाई के बीच दोबारा दुकानें सजने की शिकायत; राजनीतिक दबाव की चर्चाओं ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किल
10 दुकानें टूटीं, फिर भी रोडवेज टर्मिनल का रास्ता साफ नहीं
51 दुकानों के कब्जे में फंसी परियोजना, अधूरी कार्रवाई के बीच दोबारा दुकानें सजने की शिकायत; राजनीतिक दबाव की चर्चाओं ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किल
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
रुद्रपुर। करीब दस साल से आधुनिक रोडवेज बस टर्मिनल का इंतजार कर रहे शहरवासियों की उम्मीदें एक बार फिर अतिक्रमण के आगे अटकती नजर आ रही हैं। किच्छा रोड स्थित प्रस्तावित रोडवेज टर्मिनल की जमीन पर प्रशासन ने जेसीबी चलाकर करीब 10 दुकानों को ध्वस्त तो कर दिया, लेकिन इतनी कार्रवाई के बाद भी पूरी जमीन अतिक्रमणमुक्त नहीं हो सकी प्रस्तावित टर्मिनल की जमीन पर करीब 51 दुकानों का कब्जा परियोजना के रास्ते में बड़ा रोड़ा बना हुआ है। कार्रवाई के बाद कुछ स्थानों पर दोबारा दुकानें सजने की शिकायतों ने अभियान की गंभीरता और प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
करीब एक दशक से शहर को जिस बस टर्मिनल का इंतजार है, उसके निर्माण के लिए जमीन खाली होना सबसे जरूरी शर्त है। प्रशासन की ओर से पहले दुकानदारों को स्वयं अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए इसके बाद मुनादी कराई गई और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई कई स्थानों पर बिजली कनेक्शन काटे गए और बाद में जेसीबी की मदद से दुकानों को हटाया गया। कार्रवाई के दौरान करीब 10 दुकानों को ध्वस्त भी किया गया, लेकिन इसके बावजूद टर्मिनल के लिए प्रस्तावित पूरी जमीन खाली नहीं हो पाई।
दस दुकानें टूटने के बाद भी करीब 41 दुकानों का सवाल अब भी खड़ा है। यही अधूरी कार्रवाई रोडवेज टर्मिनल निर्माण की सबसे बड़ी अड़चन बनती जा रही है। निर्माण एजेंसी को काम शुरू करने के लिए जमीन पूरी तरह खाली चाहिए, लेकिन जब तक सभी कब्जे नहीं हटते, तब तक निर्माण कार्य आगे बढ़ाना मुश्किल है। ऐसे में प्रशासन की कार्रवाई के बाद भी परियोजना की रफ्तार पर कोई खास असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।
कार्रवाई के बाद फिर सजने लगीं दुकानें?
सबसे गंभीर बात यह है कि कार्रवाई के बाद कुछ स्थानों पर दोबारा दुकानें लगाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि अतिक्रमण हटाने के बाद उसी स्थान पर फिर से कब्जा हो रहा है तो यह प्रशासनिक कार्रवाई की स्थायित्व पर बड़ा सवाल है। इससे यह भी सवाल उठ रहा है कि आखिर हटाए गए कब्जों की निगरानी कौन कर रहा है और दोबारा अतिक्रमण होने से रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
कार्रवाई के बीच राजनीतिक दबाव की चर्चा
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बीच स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दबाव की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कार्रवाई पूरी तरह आगे नहीं बढ़ पाने और कुछ जगहों पर दोबारा दुकानें लगने की शिकायतों ने इन चर्चाओं को हवा जरूर दी है। प्रशासन के सामने चुनौती अब सिर्फ जेसीबी चलाने की नहीं, बल्कि पूरी जमीन को कब्जामुक्त कराकर उस पर दोबारा अतिक्रमण न होने देने की है।
दस साल का इंतजार, अब जमीन खाली कराने की चुनौती
रोडवेज टर्मिनल की परियोजना करीब दस साल से इंतजार में है। शहर की बढ़ती आबादी और यातायात के दबाव के बीच आधुनिक बस टर्मिनल की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। इसके बावजूद प्रस्तावित जमीन पर अतिक्रमण पूरी तरह नहीं हट पाने से परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है। सवाल यह है कि जब प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर ही दी है तो फिर पूरी जमीन खाली कराने में अड़चन कहां है?
10 दुकानें टूट गईं, लेकिन टर्मिनल की जमीन अब भी पूरी तरह खाली नहीं हुई। करीब 51 दुकानों के कब्जे में फंसी इस परियोजना के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक कार्रवाई आधी-अधूरी चलती रहेगी और शहर को रोडवेज टर्मिनल के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा?

