Wednesday, September 16, 2026
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ऊधम सिंह नगर

बार की स्वतंत्रता दांव पर, 11 राज्यों की महिला अधिवक्ताओं ने को-ऑप्शन प्रक्रिया पर उठाए सवाल निर्वाचित बार काउंसिल सीटों पर नामांकन को लेकर जताई चिंता, पारदर्शी एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग

बार की स्वतंत्रता दांव पर, 11 राज्यों की महिला अधिवक्ताओं ने को-ऑप्शन प्रक्रिया पर उठाए सवाल

निर्वाचित बार काउंसिल सीटों पर नामांकन को लेकर जताई चिंता, पारदर्शी एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांगसौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान 

बार काउंसिल के निर्वाचित निकायों में को-ऑप्शन एवं नामांकन की प्रक्रिया को लेकर 11 राज्यों की महिला अधिवक्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को “बार की स्वतंत्रता दांव पर” विषय पर आयोजित वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभिन्न स्टेट बार काउंसिल से जुड़ी महिला अधिवक्ताओं ने कहा कि महिला प्रतिनिधित्व आवश्यक है, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ और लोकतांत्रिक होनी चाहिए।प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत दिल्ली हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एन.डी. पंचोली ने की उन्होंने कहा कि किसी भी निर्वाचित बार निकाय में नामांकन का कोई भी स्वरूप बार की स्वतंत्रता से जुड़े मूलभूत प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने वर्तमान को-ऑप्शन व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए धुलिया समिति की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया और कहा कि हितधारकों की भागीदारी से तैयार रिपोर्ट पर वर्तमान प्रक्रिया में सार्थक विचार किए जाने की आवश्यकता है।

मामला सिर्फ दो महिला सीटों तक सीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एवं बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के सदस्य मेहमूद प्राचा ने कहा कि यह विवाद केवल दो महिला सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि बार की पूरी लोकतांत्रिक संरचना से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि 25 सदस्यीय बार काउंसिल की निर्वाचित सीटों को किस प्रकार नामांकित सीटों में परिवर्तित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जब संबंधित विषय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित था, तब को-ऑप्शन की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ाई गई, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने उत्तराखंड और दिल्ली में कथित पक्षपात एवं न्यायिक हस्तक्षेप तथा पंजाब एवं हरियाणा बार काउंसिल में चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर के चयन को लेकर भी सवाल उठाए।

वरिष्ठता के आधार पर चयन पर भी सवाल

कर्नाटक की वरिष्ठ अधिवक्ता विजयलक्ष्मी ने चयन में “वरिष्ठता” को आधार बनाए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि लंबे समय से प्रैक्टिस कर रही और चुनाव लड़कर अधिवक्ताओं के बीच से जनादेश हासिल करने वाली महिला अधिवक्ताओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ अधिवक्ता रेनू अग्रवाल ने भी वर्तमान प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई। वहीं सुरुचि मित्तल ने चयन के लिए वस्तुनिष्ठ एवं पारदर्शी मानदंड निर्धारित किए जाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सवाल उठाया कि निर्वाचित सीट पर प्रतिनिधि का चयन कौन करे—अधिवक्ता अपने मताधिकार के माध्यम से या नामांकन की प्रक्रिया के जरिए।

“बार काउंसिल अधिवक्ताओं के जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है”

निमरता गिल ने कहा कि स्टेट बार काउंसिल का निर्वाचन क्षेत्र व्यापक है और कुछ बार काउंसिल में एक लाख से अधिक अधिवक्ता भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि मुख्य रूप से हाईकोर्ट के निर्वाचन क्षेत्र पर केंद्रित समानांतर प्रवेश मार्ग क्यों बनाया जा रहा है, जबकि जिला न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि को-ऑप्शन की प्रक्रिया उन महिला एवं पुरुष उम्मीदवारों के चुनावी जनादेश को प्रभावित करती है, जिन्होंने चुनाव में हिस्सा लिया था। उनके अनुसार अधिवक्ताओं की संख्या में वृद्धि को देखते हुए प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर भी विचार किया जाना चाहिए उन्होंने स्पष्ट कहा, “बार काउंसिल अधिवक्ताओं के जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है, न्यायपालिका के जनादेश का नहीं।”

उत्तराखंड की शिवांगी गंगवार ने उठाई पक्षपात की शिकायतों पर चिंता

उत्तराखंड की अधिवक्ता शिवांगी गंगवार ने कहा कि उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों में पक्षपात की शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि प्रभावशाली महिलाओं को प्रतिनिधिक निकायों में प्रवेश का समानांतर मार्ग दिए जाने से चुनावी जनादेश को दरकिनार किए जाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।प्रेस कॉन्फ्रेंस की मॉडरेटर एवं झारखंड हाईकोर्ट की अधिवक्ता स्वाति सिन्हा ने बार और बेंच की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा कि दोनों संस्थाओं को समानांतर एवं स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में भी बार की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

महिला प्रतिनिधित्व का समर्थन, प्रक्रिया पर आपत्ति

महिला अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे बार निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के प्रयासों का समर्थन करती हैं। उनका कहना था कि आपत्ति महिला प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उस उद्देश्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया से है।

उन्होंने मांग की कि को-ऑप्शन के लिए स्पष्ट एवं पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए, चयन के लिए समान एवं वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित हों तथा हितधारकों की सिफारिशों पर सार्थक विचार किया जाए। साथ ही धुलिया समिति की रिपोर्ट पर प्रभावी विचार करने और अधिवक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सीटों के निर्वाचित चरित्र की रक्षा करने की मांग उठाई गई।

चार बिंदुओं का प्रस्ताव पारित

वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला अधिवक्ताओं ने चार बिंदुओं वाला प्रस्ताव भी पारित किया। इसमें बार की स्वतंत्रता की रक्षा एवं संरक्षण, चुनाव में अधिवक्ताओं का जनादेश प्राप्त करने वाली महिला उम्मीदवारों को को-ऑप्शन के माध्यम से निर्वाचित घोषित करने की मांग, को-ऑप्शन के लिए समान एवं पारदर्शी दिशा-निर्देश तय करने तथा 26 एवं 27 अप्रैल 2026 की बैठक की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग शामिल है।प्रस्ताव में लोकतांत्रिक अभियान को शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन सहित लोकतांत्रिक उपाय अपनाने की बात भी कही गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल अधिवक्ताओं ने कहा कि उनके अनुसार मूल प्रश्न यह है कि “बार के प्रतिनिधियों का चयन कौन करेगा—अपने मताधिकार के माध्यम से अधिवक्ता या नामांकन की प्रक्रिया?”

यह अभियान बार की स्वतंत्रता के लिए चिंतित अधिवक्ता तथा 11 राज्यों की स्टेट बार काउंसिल से जुड़ी महिला उम्मीदवारों की ओर से जारी किया गया।।

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