ऊधम सिंह नगर

टिकट कटा, अपमान सहा… अब वापसी का वार: कांग्रेस में ठुकराल की एंट्री से मचा सियासी भूचाल

टिकट कटा, अपमान सहा… अब वापसी का वार: कांग्रेस में ठुकराल की एंट्री से मचा सियासी भूचाल

–2022 में विवादित ऑडियो के बाद कटा टिकट, निर्दलीय लड़कर भी 30 हजार से ज्यादा वोट हासिल कर गए थे ठुकराल 

– कांग्रेस में एंट्री के साथ ही स्थानीय नेत्री के इस्तीफे से मैदान साफ होने के संकेत

 – कांग्रेस ( कैडर ) 30 हजार (लगभग) + ठुकराल के 30 हजार वोट (लगभग) = मजबूत 60 हजार का समीकरण

– 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही रुद्रपुर सीट पर मुकाबला हुआ और ज्यादा दिलचस्प 

अभिषेक शर्मा

उत्तराखंड की राजनीति में तराई का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले रुद्रपुर में एक ऐसा सियासी बवंडर आकार ले रहा है, जो 2027 की पटकथा अभी से लिखने लगा है। दो बार रुद्रपुर के विधायक रहे राजकुमार ठुकराल, जिन्हें पिछले एक दशक से रुद्रपुर की राजनीति का ‘अंगद का पैर’ माना जाता था, अब भगवा चोला उतारकर ‘हाथ’ के साथ अपनी नई पारी शुरू कर चुके हैं। लेकिन यह केवल दल-बदल नहीं, बल्कि उस ‘ ‘घायल धुरंधर’ की वापसी का शंखनाद है जिसे अपनों ने ही साजिशों के चक्रव्यूह में फंसाकर मिटाने की कोशिश की थी।सियासत के इस खेल में असली ‘ट्विस्ट’ 2022 के चुनाव में आया। जब एक कथित विवादित ऑडियो को हथियार बनाकर विरोधी खेमे ने ऐसी बिसात बिछाई कि दिल्ली और देहरादून के गलियारों में ठुकराल की छवि को धूमिल कर उनका टिकट कटवा दिया गया। लेकिन यह हमला सिर्फ टिकट पर नहीं, एक जमीनी नेता के वजूद पर था। फिर भी, बिना किसी सिंबल और बिना किसी झंडे के, ठुकराल ने निर्दलीय मैदान में उतरकर 30 हजार से अधिक वोट हासिल किए और यह साबित कर दिया कि रुद्रपुर की जनता में ठुकराल का अपना कैडर वोट है।

लेकिन सबसे बड़ा छलावा तो निकाय चुनाव के दौरान हुआ। संगठन के कुछ लोगों ने ठुकराल की ताकत को फिर से भुनाने के लिए उन्हें ‘घर वापसी’ का वो सुनहरा जुमला दिया जो अंत में सिर्फ एक धोखा साबित हुआ। ठुकराल ने अपनी पूरी निष्ठा के साथ भाजपा प्रत्याशी को चुनाव लड़ाया और जीत की दहलीज तक पहुंचाया, लेकिन जीत का सेहरा बंधते ही उन्हें फिर से गुब्बारा दिखाकर दरकिनार कर दिया गया। महीनों तक पार्टी के दरवाजे खटखटाने और हर बार सिर्फ आश्वासन मिलने के बाद ठुकराल और उनके कट्टर समर्थको ने समझ लिया कि वफादारी की कीमत अब यहाँ अपमान से चुकाई जा रही है।

अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। राजकुमार ठुकराल ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है और कांग्रेस की नेत्री मीना शर्मा का इस्तीफा इस बात का साफ संकेत है कि अब मैदान पूरी तरह खाली और ठुकराल के लिए तैयार है। यह बात कोई हवाई नहीं बल्कि आंकड़ों इसके गवाही देते है । 2022 में कांग्रेस के पास 40 हजार से अधिक वोट थे और ठुकराल के अपने 30 हजार के करीब वफादार वोट। इन दोनों का मिलन 70,000 वोटों का वो ‘सियासी बारूद’ है, जो किसी भी बड़े से बड़े प्रतिद्वंदी के पैर उखाड़ने के लिए काफी है।

चर्चाएं गरम हैं कि सूबे के मुखिया भी खुद रुद्रपुर को अपना अगला सुरक्षित किला मान रहे हैं, लेकिन उनका सामना अब उस ‘धुरंधर’ से है जिसे धोखे की आग ने और भी ज्यादा घातक बना दिया है। इस बात में भी कोई दोराहे नहीं है कि ठुकराल की छवि एक ऐसे नेता की है जो आधी रात को भी कार्यकर्ता के लिए लाठियां खाने को तैयार रहता है।2027 का रण अब सिर्फ वोटों की गिनती नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि शहर की सियासत का असली हकदार जिसे माना जा रहा था क्या वह ही इसके काबिल था या जनता फिर एक बदलाव चाहती है।

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