रूद्रपुर में ठुकराल ही लगा सकते हैं कांग्रेस की नैया पार ! – ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री हुई तो बदल सकते हैं रूद्रपुर विधानसभा सीट के समीकरण – ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने की सुगबुगाहट के बीच विरोधियों ने खोला मोर्चा
रूद्रपुर में ठुकराल ही लगा सकते हैं कांग्रेस की नैया पार !
– ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री हुई तो बदल सकते हैं रूद्रपुर विधानसभा सीट के समीकरण
– ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने की सुगबुगाहट के बीच विरोधियों ने खोला मोर्चा
सौरभ गंगवार/टुडे हिंदुस्तान
रुद्रपुर। उधम सिंह नगर की हॉट और वीआईपी मानी जाने वाली जिला मुख्यालय रुद्रपुर विधानसभा सीट पर आगामी चुनावी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। चुनावी वर्ष की आहट से पहले ही रुद्रपुर का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और इस पूरे घमासान के केंद्र बिंदु बने हुए हैं पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल। शहर के चौक-चौराहों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक सिर्फ एक ही चर्चा आम है कि यदि राजकुमार ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री होती है, तो रुद्रपुर विधानसभा सीट के समीकरण न केवल बदलेंगे, बल्कि सत्ताधारी दल भाजपा के लिए अपने इस अभेद्य दुर्ग को बचाना टेढ़ी खीर साबित हो जाएगा। ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने की प्रबल सुगबुगाहट ने जहाँ कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार किया है, वहीं दूसरी ओर उनके धुर विरोधियों ने भी लामबंद होकर मोर्चा खोल दिया है, जिससे यह साफ है कि ठुकराल की राह में कांटे बिछाने के लिए एक नया सियासी तूफान खड़ा किया जा चुका है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो राजकुमार ठुकराल का रुद्रपुर की राजनीति में एक अलग ही रसूख रहा है। भारतीय जनता पार्टी के साथ दो बार विधायक की पारी खेलने वाले ठुकराल ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद जिस तरह से बगावत का बिगुल फूंका था, उसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी सोचने पर मजबूर कर दिया था। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी समर में उतरने के बावजूद ठुकराल ने जो मत हासिल किए, उसने यह स्पष्ट प्रमाण दिया कि उनका जनाधार किसी सिंबल का मोहताज नहीं है। भले ही उस चुनाव में वह तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन उनकी ताकत ने जीत और हार के अंतर को जिस तरह प्रभावित किया, उसने रुद्रपुर में ‘ठुकराल फैक्टर’ की अहमियत को रेखांकित कर दिया। पिछले चार वर्षों के अंतराल में उनकी भाजपा में घर वापसी की चर्चाएं कई बार उठीं, विशेषकर निकाय चुनाव के समय जब उन्होंने मेयर पद के लिए अपनी दावेदारी मजबूत की थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आश्वासन पर कदम पीछे खींचने के बाद माना जा रहा था कि उनकी घर वापसी का रास्ता साफ होगा, लेकिन समय के साथ वे तमाम संभावनाएं धुंधली होती गईं और भाजपा के प्रति ठुकराल की आशाएं निराशा में बदलती चली गईं।
अब जबकि आगामी विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज है, कांग्रेस को इस सीट पर एक ऐसे ‘मास लीडर’ की तलाश है जो सीधे तौर पर भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को चुनौती दे सके। वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस के पास स्थानीय स्तर पर किसी ऐसे चेहरे का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है जिसकी स्वीकार्यता पूरे विधानसभा क्षेत्र में हो। ठुकराल की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि सत्ता से बाहर रहने और बिना किसी आधिकारिक पद के होने के बावजूद वह धरातल पर लगातार सक्रिय हैं। जनहित के मुद्दों पर उनकी आक्रामक कार्यशैली और प्रशासन से भिड़ जाने का बेबाक अंदाज आज भी कायम है, जो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को रुद्रपुर की हारी हुई बाजी जीतने की एक बड़ी उम्मीद दे रहा है। राजनैतिक पंडितों का मानना है कि यदि ठुकराल कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरते हैं, तो यह न केवल कांग्रेस के लिए किसी चमत्कारिक संजीवनी की तरह होगा, बल्कि भाजपा के अभेद्य किले में सेंध लगाने का सबसे सटीक हथियार भी साबित होगा।
हालांकि, ठुकराल की कांग्रेस में एंट्री की राह में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही खेमों के विरोधियों का एक बड़ा अवरोध खड़ा है। कांग्रेस का एक खेमा उनके आगमन को अपने निजी राजनैतिक अस्तित्व के लिए खतरा मान रहा है। यही वजह है कि उनकी जॉइनिंग की खबर तेज होते ही साल भर पुराने उन विवादित ऑडियो क्लिप्स को दोबारा हथियार बनाया गया है जो अब तक ठंडे बस्ते में पड़े थे। इन ऑडियो क्लिप्स के बहाने पुलिसिया कार्रवाई और रिपोर्ट दर्ज होने के पीछे का असली खेल ठुकराल के राजनैतिक भविष्य को बाधित करना ही नजर आता है। विरोधियों का यह मोर्चा दरअसल इस डर का परिणाम है कि ठुकराल के आने से जहाँ भाजपा को एक सशक्त विपक्ष का सामना करना पड़ेगा, वहीं स्थानीय कांग्रेस नेताओं की जमीनी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी।
इन तमाम विरोधों और कानूनी दांव-पेंचों के बीच सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को लेकर है। वर्तमान में रुद्रपुर सीट पर विपक्ष लगभग निष्क्रिय और गुटबाजी का शिकार नजर आता है। जमीनी मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरने में विफल रही कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है, जिसका असर पिछले चुनावों के परिणामों में साफ देखा गया है। हालत यह है कि शहर के कई वार्डों में कांग्रेस पार्षद होने के बावजूद वे सत्ता पक्ष के साथ तालमेल बिठाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। ऐसी स्थिति में, ठुकराल जैसे ऊर्जावान और विवादों के बावजूद अपनी एक अलग पहचान रखने वाले नेता की एंट्री ही कांग्रेस को रुद्रपुर में पुनर्जीवित कर सकती है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस हाईकमान स्थानीय विरोध को तवज्जो देता है या फिर चुनावी जीत के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ठुकराल के लिए ‘हाथ’ का साथ सुनिश्चित करता है।
सियासी ‘स्क्रिप्ट’ में मीना शर्मा का किरदार, ऑडियो का पुराना जिन्न और अचानक जागी ‘नैतिकता’
रुद्रपुर की राजनीति में इन दिनों एक पुरानी ऑडियो क्लिपिंग को लेकर जो ‘हाई वोल्टेज ड्रामा’ चल रहा है, उसकी सूत्रधार बनकर उभरी मीना शर्मा की भूमिका पर भी अब सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि जो ऑडियो क्लिप पिछले एक साल से ठंडे बस्ते में धूल फांक रही थी, ठुकराल की कांग्रेस में संभावित एंट्री की आहट सुनते ही वह अचानक मीना शर्मा के लिए ‘न्याय की पुकार’ कैसे बन गई?
बीते एक साल से पुलिस की फाईल में धूल फांक रही जिस तहरीर पर मीना शर्मा ने किसी बड़े अधिकारी से शिकायत की जहमत नहीं उठाई उस तहरीर पर कार्रवाई के लिए अचानक वह आत्मदाह तक की धमकी देने लगी। राजनीति के माहिर खिलाड़ी इसे महज एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि ठुकराल की राह रोकने के लिए लिखी गई एक सुनियोजित ‘सियासी पटकथा’ का हिस्सा मान रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर मीना शर्मा की यह बेबाकी जनहित के मुद्दों पर इतनी मुखरता से क्यों नहीं दिखती? चर्चा यह भी है कि ठुकराल विरोधियों के हाथों की ‘कठपुतली’ बनकर पुलिस की दहलीज तक पहुंचने वाली मीना शर्मा की यह अचानक जागी ‘नैतिकता’ कहीं अपनी खिसकती राजनैतिक जमीन को बचाने का आखिरी दांव तो नहीं? जानकार कहते हैं कि जब-जब ठुकराल की सियासी नैया किनारे की ओर बढ़ती है, तब-तब ऐसे ‘जिन्न’ बाहर निकाल लिए जाते हैं, लेकिन इस बार जनता इस ‘ऑडियो पॉलिटिक्स’ के पीछे छिपे असली चेहरों को बखूबी पहचान रही है।।

